Pacific Island Countries Want a World Without Nuclear Weapons - Hindi

पैसिफिक द्वीपीय देश परमाणु हथियार मुक्त दुनिया चाहते हैं

दवारा - नीना भंडारी

सिडनी (आईडीएन) - जैसे-जैसे मध्य पूर्व एवं उत्तरी अफ्रीका के राजनीतिक संघर्ष में आईएसआईएस (ISIS) जैसे आतंकी संगठनों दवारा बर्बर हिंसा की संभावना बढ़ रही हैं, और यूक्रेन संकट के कारण यूएस, उसके नाटो सहयोगी एवं रूस के बीच शीत युद्ध के पुन: सुलगने की आशंका है; तब इस बात की प्रबल आवश्यकता है कि परमाणु हथियार सम्पन्न एवं गैर परमाणु हथियार वाले देश संयुक्त रूप से परमाणु हथियारों के सम्पूर्ण रूप से उन्मूलन के लिए कार्य करें। आज परमाणु हथियारों दवारा सम्पूर्ण विनाश की आशंका पहले की अपेक्षा ज्यादा प्रबल है, चाहे इन हथियारों का प्रयोग जानबूझ कर या अनजाने ही क्यों न हो जाये।

ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड तथा पैसिफिक द्वीप के देश विश्व में चल रहे परमाणु हथियारों के अप्रसार संधि (एनपीटी) के क्रियान्वयन में अग्रणी हैं, जो कि परमाणु हथियार वाले देशों द्वारा पूर्ण निरस्त्रीकरण के लक्ष्य को हासिल करने के लिए एकमात्र बहुपक्षीय प्रतिबद्धता है। लेकिन अप्रैल 27 से मई 22 के दौरान आयोजित एनपीटी का नौवां पुनरावलोकन सम्मेलन, जिसके तीन मुख्य स्तम्भ थे - अप्रसार, निरस्त्रीकरण एवं परमाणु उर्जा का शांतिपूर्ण प्रयोग - इसमें परमाणु हथियारों से युक्त देशों एवं परमाणु पर आश्रित उनके कुछ सहयोगी देशों के विचारों एवं सरोकारों को बेहतर तरीके से परिलक्षित करता है।


एक तरफ जहां 2015 का पुनरावलोकन सम्मेलन परमाणु हथियारों से युक्त देशों द्वारा निरस्त्रीकरण के लिए की गई प्रतिबद्धता के क्षेत्र में 2010 में आयोजित पुनरावलोकन सम्मेलन से एक कदम पीछे जाता है, वहीं यह निरस्त्रीकरण के लिए आगे की ओर उठने वाला कदम भी था क्योंकि ऑस्ट्रेलिया द्वारा पेश की गई मानवीय प्रतिज्ञा पर गैर परमाणु वाले देशों द्वारा आगे बढ़ कर हस्ताक्षर किया गया। 14 जुलाई तक 113 देशों ने इस प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर किया है जो कि हस्ताक्षरकर्ताओं को परमाणु हथियारों के अस्वीकार्य मानवीय परिणामों के कारण उनके उपयोग पर प्रतिबंध एवं निर्मूलन के लिए एक नये वैध उपकरण हेतु कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध करता है।

इस मानवीय प्रतिज्ञा पर पैसिफिक द्वीप समूह के दस देशों द्वारा हस्ताक्षर किया गया है जिसमें - कुक आइलैंड्स, फिजी, किरिबाती, मार्शल द्वीप, नियू, पलाऊ, पापुआ न्यू गिनी, समोआ, तुवालु, और वानुअतु शामिल हैं; जबकि टोंगा एवं माइक्रोनेशिया संघीय राज्य अपवाद स्वरूप शामिल नहीं हैं। 1956 से 1996 के मध्य पैसिफिक द्वीप समूह के देश अनिच्छुक रूप से यूएस, यूके एवं फ्रांस द्वारा परमाणु हथियारों के परीक्षण से पीड़ित रहे हैं।

टोनी दे ब्रूम, रिपब्लिक ऑफ मार्शल आइलैंड (आरएमआई) के विदेशी मामलों के मंत्री, 1954 में सिर्फ नौ वर्ष के थे जब उन्होंने अपने दादा के साथ लिकिएप एटोल में मछली पकड़ने के दौरान देखा की अचानक एक तीव्र फ़्लैश के कारण समुद्र, मछली एवं आसमान लाल हो उठा, जैसे भोर के समय आकाश लाल हो उठता है, इससे एक सदमे की लहर सी फ़ैल गई। वे सभी ग्राउंड जीरो से 200 मील दूर थे और वे आज तक उस भयावह दिन को नहीं भुला पाये हैं।

आरएमआई परमाणु हथियारों के कारण होने वाले वीभत्सकारी मानवीय परिणामों पर प्रकाश डालते हुए परमाणु निरस्त्रीकरण एवं अप्रसार की पुरजोर वकालत करता रहा है। 1946 से 1958 के मध्य यूएस द्वारा परमाणु हथियारों के 67 वायुमंडलीय परीक्षण किये गये जिसका प्रभाव सर्वाधिक रूप से मार्शल आइलैंड पर अनवरत नुकसान एवं रेडियोलॉजिकल प्रदूषण के रूप में पड़ा। इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस, द हेग में परमाणु हथियारों वाले देश के खिलाफ केस में इन्होंने इसके मानव विस्थापन, मौत एवं उसके स्वास्थ्य जनित प्रभावों के इतिहास को रखा जो कि इस तरह के केस में मील का पत्थर साबित हुआ।

डी ब्रूम ने आईडीएन से कहा कि "यह उचित समय है जब गैर परमाणु वाले देश साथ मिल कर परमाणु हथियार के रोकथाम एवं उसे पूर्ण रूप से हटाने के लिए एक नई संधि हेतु कार्य करें। साक्ष्य यह प्रमाणित कर रहे हैं कि वैधानिक दायित्यों के बावजूद भी परमाणु हथियार वाले देश अभी इस बात पर नेतृतव करने के लिए तैयार नहीं हैं। बजाय इसके उनका मानना है कि उन्हें परमाणु रखने, परमाणु खतरों और संभावित परमाणु उपयोग के आधार पर अपनी सुरक्षा तय करने का विशेष अधिकार प्राप्त है, जबकि वास्तव में ऐसा है नहीं। ऐसा करने से यह देश अपनी सुरक्षा के साथ-साथ अन्य सभी देशों एवं सम्पूर्ण मानवता की सुरक्षा को दुर्बल कर रहे हैं।

पैसिफिक में परमाणु हथियारों के परीक्षण एवं सैन्यकरण के विरोध में पूर्व में चल रहे आंदोलनों में हिस्सा लेने वाले ऐसे ही एक शख्स फ़िजी के वनीस्सा ग्रिफ्फिन ने कहा, " पैसिफिक में हम सभी ने सामूहिक रूप से परमाणु हथियारों के ज्ञात एवं अज्ञात परिणामों को अनुभव किया है, आज यह समय की मांग है कि गैर परमाणु वाले देश परमाणु हथियारों पर पूर्ण प्रतिबन्ध की मांग करें, केवल यही एक सुसंगत, मानवीय एवं जिम्मेदारी भरा कारवाई का रास्ता है। परमाणु हथियार वाले राज्य संयुक्त रूप से अवैधानिक एवं अंतरराष्ट्रीय मानवीय मानकों के उल्लंघनकर्ता के रूप में माने जायें। "

परमाणु अप्रसार संधि को 1995 में अनिश्चितकाल के लिए बढ़ाया गया। इसका अनुच्छेद आठ यह कहता है कि इस संधि की हर पांच साल में समीक्षा की जानी चाहिए। हर पांच वर्षों में समीक्षा की प्रक्रिया यह सुनिश्चित करने के लिए थी कि परमाणु हथियार वाले देश निरस्त्रीकरण को नीति के रूप में अपनायेंगे, पर पिछले पांच वर्षों में परमाणु हथियार वाले देशों ने अपने हथियारों के आधुनिकीकरण पर ज्यादा खर्च किया है।

ऑस्ट्रेलिया अधिकृत रूप से परमाणु हथियारों को नहीं रखता है, लेकिन यह यूएस गठबंधन के तहत परमाणु शक्ति संतुलन के समझौतों को मानता है जो कि ऑस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय सुरक्षा की रणनीति के रूप में देखा जाता है। अभी तक ऑस्ट्रेलिया ने मानवीय प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किया है। विदेश मामलों और व्यापार (DFAT) के ऑस्ट्रेलियाई विभाग के एक प्रवक्ता ने आईडीएन से कहा "हमें ऐसे वातावरण का निर्माण करना चाहिए जहाँ सभी देश, वे भी जिनके पास परमाणु हथियार हैं, तथा वे जो उनकी परमाणु शक्तियों पर आश्रित हैं, उन सभी को यह विश्वास हो कि वे सभी परमाणु अस्त्रों के बिना ज्यादा सुरक्षित हैं।"

शांति, न्याय एवं पर्यावरण से जुड़े कार्यकर्ता, मत आधारित संगठन, सिविल सोसाइटी संगठन, विज्ञानं एवं चिकित्सा क्षेत्र के विशेषज्ञ तथा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा लगातार ही वार्ता की मांग की जा रही है जिससे तुरंत ही सख्त एवं प्रभावी अंतर्राष्ट्रीय नियंत्रण के तहत परमाणु हथियारों को खत्म करने की दिशा में कार्य शुरू किया जा सके।

आईसीएएन (ICAN) के ऑस्ट्रेलियाई निदेशक टिम राईट ने न्यूयॉर्क में नौवीं समीक्षा सम्मेलन में प्रतिभागिता निभाई, उन्होंने कहा, "समीक्षा सम्मेलन के दौरान, ऑस्ट्रेलिया ने निरस्त्रीकरण के सवाल पर अपने आपको पीछे खींच लिया क्योकि उसका यह मानना है कि कुछ निश्चित परिस्थितियों में परमाणु हथियारों का उपयोग वैध और आवश्यक है। यह रुख, मेरे विचार में, बहुत हद तक अनैतिक है। लेकिन मैं यह आशा रखता हूँ कि अभी या बाद में, ऑस्ट्रेलियाई सरकार परमाणु हथियारों को खारिज करने की दिशा में चल रहे अंतरराष्ट्रीय प्रयासों में शामिल हो जाएगी। ऑस्ट्रेलियाई लोगों की उम्मीद और मांग भी यही है। "

परमाणु लड़ाई की रोकथाम के लिए चिकित्सकों के अंतरराष्ट्रीय संगठन के सदस्य डॉ स्यू वारेहम ने आईडीएन (IDN) से कहा कि परमाणु हथियार हम सभी के लिए सामान्य खतरा है तथा सहयोग, सहकारिता "दुश्मनों" के साथ भी संभव है। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि "यहाँ तक इजराइल को भी यह समझना होगा कि उनका परमाणु हथियार उनके लिए सिरदर्द अधिक है क्योंकि यह उस क्षेत्र में दूसरे देशों को अपने स्वयं के हथियार हासिल करने के लिए उकसाने का कार्य कर रहा है।

पिछले पांच वर्षों में, परमाणु हथियारों के मानवीय परिणामों का निरस्त्रीकरण की कूटनीति में सबसे प्रभावी तरीके के रूप में उपयोग किया गया है। न्यूजीलैंड, नया एजेंडा गठबंधन (NAC) के अध्यक्ष के रूप, उन्हें आधार पत्र 9 तैयार करने की जिम्मेवारी दी गई, जिसमें NPT के अनुछेद VI के अनुसार परमाणु निरस्त्रीकरण बाध्यताओं को लागू करने की दिशा में कानूनी तंत्र के लिए संभावित रास्तों का मसौदा तैयार करना शामिल था।

परमाणु अस्त्रों के पूर्णतया रोकथाम एवं उसे खत्म करने की दिशा में जो मुख्य बाधा है वह है परमाणु हथियारों वाले देशों के दो तरह के नियम: जिसमें एक उनके खुद के लिए है एवं दूसरा अन्य सभी के लिए है। वारेहम कहते हैं "वैसी बाधा पर कम ध्यान दिया गया है जो कि यूएस गठबंधन द्वारा निभाया जा रहा है जैसे कि ऑस्ट्रेलिया, जो की एक तरफ अपने आका से परमाणु अस्त्रों को बनाये रखने का अनुरोध करता है वहीँ दूसरी तरफ निरस्त्रीकरण के मामलों में अपना मुखौटा आगे रखे हुए है। यदि यूएस का एक निकटतम सहयोगी संबंध तोड़ दे एवं परमाणु हथियारों से 'संरक्षण' से इंकार कर दे तब इसका बहुत बड़ा प्रभाव पड़ेगा। "

परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के अस्तित्व में आने के चार दशकों के बाद भी, लगभग 1800 परमाणु हथियार ऐसी अवस्था में रखे गए हैं कि उन्हें कभी भी चलाया जा सकता है। प्रोफेसर रमेश ठाकुर, निदेशक, परमाणु अप्रसार एवं निरस्त्रीकरण केन्द्र, ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी क्रॉफोर्ड स्कूल ऑफ़ पब्लिक पालिसी का कहना है, "शायद अब आज की तारीख में एनपीटी की सार्थकता नहीं रह गई है, अब विश्व को एनपीटी के बाद की रणनीति में जाना होगा जिसमें वर्तमान में मौजूद वैश्विक परमाणु व्यवस्था को छेड़ा न जाये एवं यह दृढ़ता पूर्वक एनपीटी में आये। जबकि परमाणु अप्रसार को मानना बाध्य होगा, जिसे एनपीटी के तहत मापा एवं लागू किया जा सकेगा, वहीं निरस्त्रीकरण बाध्यताएं नहीं होंगी। " [आईडीएन-InDepthNews - 22 जुलाई 2015]